ये उन दिनों की बात है

जब मै मीडिआ में

ग्राफ़िक डिजाइनर  हुआ करता था ,

और जब स्क्रीन पर

कोई केम्पेन देखता था

तो अपनी डायरी में लिखा करता था

की मैं होता तो ये केम्पेन कैसा होता।

           

Dr Kailash Kumar Mishra

कविता के तुम भाई हो
लेखों के तुम साँई हो,
गर खड़े हो गए मंच पर
तो समारोह के नाई हो।
वाद विवाद की दाई हो
ज्ञान का सागर हो
कला की गागर हो।

नाम तुम्हारा है कैलाश
वाणी मैं है मिश्री का वास,
एक बार जब मिले किसी से
बना देते वो लम्हा खास।

खैरियत जानने के लिए पहले
लिखते थे ख़त,
फिर दौर आया फ़ोन का
ट्रंकाल लगाया करते थे।
आज बात चीत करना सरल है
पर हम,
चैट मे online स्टेटस देख
तसल्ली दे लेते है मन को
की सब कुछ ठीक है।
वक़्त वक़्त की बात है,
एक वक़्त था कि लैंडलाइन फोन थे,
किसी से बात करने के लिए
घर या ऑफिस की जरुरत पड़ती थी।
आज वक़्त बेवक़्त भी कही से
किसी से भी बात कर सकते है।
रिश्ते दूर दूर हुआ करते थे
पर चिट्ठियां और एसटीडी काल
उन्हें पास ला दिया करते थे।
जो मजा उन कागज की चिट्ठियों में था
वो आज की ईमेल में कहाँ है?
जो घंटो इंतजार के बाद ट्रंकाल काल में था
वो आज के इंस्टेंट काल में कहाँ।
जब कही जाते थे तो सात दिन में
पोस्टकार्ड से पहुचने की खबर पहुचती थी
वो सात दिनों मे भरोसा होता था।
पर आज कही जाते है तो सात काल हो जाते है
इंतजार अब खबर बन गया है।
उस वक़्त दूरियों में
नजदीकियां बसती थी,
और आज हम नजदीक होकर भी
दूर हो गए है।
कहते है साइंस ने बहुत तरक्की की है
दुनिया को पास लादिया है
अगर इसे ही पास लाना कहते है
तो वो दूरियां ही अच्छी थी।
सात दिन लगते थे,
पर अपने, अपने लगते थे।

Risk

 

चला था सफर में सोचा कर की सुरक्षित हूँ ,

मेरी सुरक्षा कहा कहाँ खर्च हो गयी पता ही न चला।

रिस्क पहले दिन से ही मेरे साथ थी घूघट में,

आज घूघट उठा दिया रिस्क से

बना लिया उसे अपना,

तो रिस्क ही बनगई सुरक्षित हमसफ़र

क़तरा-क़तरा …

qatraqatra1

 

जब आँख खुली

मैं एक किरदार बन गया

इस दुनियां के रंगमंच का,

आये दिन रोल बदलते हैं

डायलॉग बदलते है,

कभी लड़ाई

तो कभी मनोरंजन,

रोना धोना भी

लगा रहता है.

आँखे जैसे एक

कैमरा हो गयी है;

जिसमें मैं

मुझी को देखता हूँ

इस नाटक में

रोज़ क़तरा-क़तरा

 

Sabki Bari

जाना तो सभी को है
फिर आने के लिये।
दिन भर गरमाया
सूरज भी जाता है,
चाँद को जो
आना होता है
सितारों के साथ।
सबकी बारी होती है,
आज मेरी थी;
कल तुम्हारी;
और फिर मेरी,
जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…

 

Vibrants

संभावनाओ के बीज
उगाते है हम,
integrity जमी मिलजाए
और commitment का पानी
तो आसमा हमारा होगा।
enrollment में possibility
दिखाते है हम,
लोगो को opportunity दिख जाये
तो हवाओं का रुख
बदल जायेगा।
सबकी काबिलियत पे
ताली बजाते है हम ,
acknowledgment की
लडिया बनाते है हम,
हर किसी में
लीडर जागते है हम
क़तरा -क़तरा

आँख खुली तो सबसे पहली मुलाकात
एक रंग से हुई
और तब से
ये मुलाकातों का  सिलसिला जारी है।
हम  आये थे एक स्वच्छ – साफ़ – श्वेत
चेहरा लिए मन का,
रंगों ने दे दिए हमें अलग-अलग रूप, पेहचान,
ये रंग हैं वक्त के, व्यवहार के, व्यक्तित्व के।
हम जब भी कहीं देखते है,
एक नया रंग दिखता है।
ये चहरे है रंगों के
ये रंग है जिंदगी के।


फोटो ही तो जो याद दिलाते है
गुज़रे लम्हे एक फिल्म की तरह .
सबकुछ कितना fast rewind हो जाता है
आँख बंद करो तो .
एक-एक करेक्टर बोलने लगता है
कुछ echo sound में आवाजें सुनाई  देने लगती हैं
कुछ गाने, कुछ संगीत .
फोटो जिन्दा हो जाता है ,
और जैसे ही आँख खुलती है
fast forward
हम आज में उसकी खुशबू ले रहे होते है
और ज़िन्दगी यू ही चलती रहती है
क़तरा-क़तरा

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