qatraqatra1

 

जब आँख खुली

मैं एक किरदार बन गया

इस दुनियां के रंगमंच का,

आये दिन रोल बदलते हैं

डायलॉग बदलते है,

कभी लड़ाई

तो कभी मनोरंजन,

रोना धोना भी

लगा रहता है.

आँखे जैसे एक

कैमरा हो गयी है;

जिसमें मैं

मुझी को देखता हूँ

इस नाटक में

रोज़ क़तरा-क़तरा

 

Sabki Bari

जाना तो सभी को है
फिर आने के लिये।
दिन भर गरमाया
सूरज भी जाता है,
चाँद को जो
आना होता है
सितारों के साथ।
सबकी बारी होती है,
आज मेरी थी;
कल तुम्हारी;
और फिर मेरी,
जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…

 

COPYRIGHT 2009, The blog author holds the copyright over all blog posts