आज किसी ने ईमेल मे कहा
पेहचाना !
पहचान तो लिया था .
मेल सात समुन्दर पार से था,
नाम के पीछे कुछ और लगा था .
सालों का फासला सेकंडों मे तय हुआ
यादों का एक श्वेत केनवास उभरा
और धीरज धरे सबकुछ रंगने लगा.

हम 1992 मे थे अब
जहाँ से शुरू हुआ था
रंगों की दुनिया का सफ़र…

5 Responses to “पेहचाना !”

  1. मीनाक्षी Says:

    यादों का एक श्वेत केनवास उभरा
    और धीरज धरे सबकुछ रंगने लगा — खूबसूरत भाव..
    एक बार की पहचान सदा याद रहती है.. भूलती कहाँ है…

  2. Dimple Says:

    jo aapne likha hai inn chandd panktiyon mein wo seedha dil pe asar karti hain…!! khoob kahi!!

    Rgds,
    Dimple

  3. Umesh Says:

    Ajnabi Tum Jaane Pehchaane Se Lagte Ho…
    Purani Yaadein aur woh Beete huve Pal…
    Bhala Kaise Bhulaaye Ja Sakte hain…
    Aapke Lagaye Huve Chitra Mein…
    Deviyon Ke Chehare pe Bahut Udasi hai…
    Jab Pehchaan Hi liya hai to Haste huve chehare lagao…
    Yeh Bhi Khoob Rahi, Pehchaana…

  4. Yatish Says:

    उमेश जी, भीड़ मे सब एक जैसे लगते है पर जाना-पेहचाना कही भी हो दिख जाता है, पेहचान मे आ जाता है.

  5. Umesh Says:

    Real Photo hoti to shayad hum bhi woh chehara dekh lete

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