ऊचाई पे पहुचने पे
नीचे  कुछ नहीं दिखता,
सिर्फ गहरे घने साये रह जाते है.
जिसमे दफ़्न हो जाते है सारे अतीत,
रौशनी आती जाती रहती है कभी-कभी
जो छेड़ देती  है कुछ अहसासों को,
मुरझाती  सी
मुस्कराती सी.

ऊचाइयाँ भी खुश
गहराइयाँ भी खुश
बस यही चलता है
ज़िन्दगी भर
क़तरा-क़तरा…

2 Responses to “ऊचाइयाँ”

  1. Umesh Says:

    Roshni to sada Positive part ki aur le ke jaati hai (Murjhati si ko link kar sakte ho ateet ki Tadapti Yaadon ke saath)

  2. rachna Says:

    nice poem yatish

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