Risk

 

चला था सफर में सोचा कर की सुरक्षित हूँ ,

मेरी सुरक्षा कहा कहाँ खर्च हो गयी पता ही न चला।

रिस्क पहले दिन से ही मेरे साथ थी घूघट में,

आज घूघट उठा दिया रिस्क से

बना लिया उसे अपना,

तो रिस्क ही बनगई सुरक्षित हमसफ़र

क़तरा-क़तरा …

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जब आँख खुली

मैं एक किरदार बन गया

इस दुनियां के रंगमंच का,

आये दिन रोल बदलते हैं

डायलॉग बदलते है,

कभी लड़ाई

तो कभी मनोरंजन,

रोना धोना भी

लगा रहता है.

आँखे जैसे एक

कैमरा हो गयी है;

जिसमें मैं

मुझी को देखता हूँ

इस नाटक में

रोज़ क़तरा-क़तरा

 

Sabki Bari

जाना तो सभी को है
फिर आने के लिये।
दिन भर गरमाया
सूरज भी जाता है,
चाँद को जो
आना होता है
सितारों के साथ।
सबकी बारी होती है,
आज मेरी थी;
कल तुम्हारी;
और फिर मेरी,
जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…

 

आँख खुली तो सबसे पहली मुलाकात
एक रंग से हुई
और तब से
ये मुलाकातों का  सिलसिला जारी है।
हम  आये थे एक स्वच्छ – साफ़ – श्वेत
चेहरा लिए मन का,
रंगों ने दे दिए हमें अलग-अलग रूप, पेहचान,
ये रंग हैं वक्त के, व्यवहार के, व्यक्तित्व के।
हम जब भी कहीं देखते है,
एक नया रंग दिखता है।
ये चहरे है रंगों के
ये रंग है जिंदगी के।


नाम याद नहीं रहते
चेहरे बोलते है,
बोलती है उनकी परछाइयां ,
रोज़ कोई आता है
कोई चला जाता है,
ना जाने ये सिलसिला
कब से चालू है,
पर कोई अपनी
छाप छोड़ जाता है,
कोई याद रह जाता है,
दुनियां की इस भीड़ मे
क़तरा-क़तरा…


उम्मीदें कुछ धुधली सी है
चमकती है
और
ओझल हो जाती है.

ना जाने कब थमेगा
ये सिलसिला.

पर कहीं ना कहीं
छिपी है वो
जो साथ देगी मेरा
एक दिन …


चाह कितनी तेज होती है
ना चेहरा देखा
ना बात की ,
पढ़ा कुछ अल्फाजों को
और छू गए दिल को,
एक लम्बी सॉँस ली
और सारा बदन सिहर गया.

ऐसा ही होता है
शब्दों का जादू
अच्छे लगे तो
सबकुछ अच्छा लगता है
बिन देखे
बिन जाने

आज कोई ख्वाब टूटा है कही
कही न कहीं सबके ख्वाब टूटते है
पर मन का इकतारा
बजाता रहता है एक धुन
बार बार जुड़ने की.
ये धुन कभी बंद नहीं होती
हम ही इकतारे के
दिए की  तरह
मिल जाते है मिट्टी मे
पर ये तार ख्वाबो के
जुड़े रहते है कही न कही
आज हम से कल किसी और से …

रोज नए रंग में मिलती है ज़िन्दगी
रोज रिश्ते नए रंग दिखाते है,
मेलजोल भाईचारा
सब रंगों में ही तो रमे है
रोज रंगते है हम
इन रंगों में,
रोज नए ढंग से
रंगती है जिंदगी
रोज एक होली होती है …

बाजू में बंधी कुछ दुआएं
और हाथों में झूलती
कुछ उलझी हुयी सी
रंग बिरंगी कश्मकसें
कुछ कह रही थी आज,
बना रही यही
अपने अतीत की तस्वीरें
वर्तमान के केनवाश पर.

लाइने  खिचने लगी
और बनगया
एक स्टोर रूम,
जिसमें थे नक्कासी किये
यादों के संदूक,
उजले-उजले से
कुछ आईने और
सुर्ख सफ़ेद पोशाकें.

वो बतियाती खिलखिलाती
और बस खो जाती
जैसे फरिश्तों के देश मे
एक नन्ही परी,
वो कमरा जैसे कमरा नहीं
एक सपनों की दुनिया हो
उजली सी,

वक्त गुजरा
देश छूटा
रूह से ज़ुदा हो गयी ज़िन्दगी,
बड़े-बड़े खुले से वीराने ;
ढूढने लगी अपनी ही पहचान,
ना कोई आइना, न कोई संदूक
बस मीलों दूर
सफ़ेद ही सफ़ेद
बिखरे हुए शून्य.

समय की सुई फिर आयी
अपनी जगह
लगा जैसे नया युग
फिर शुरू हुआ है,
ढूढने लगी उन नाजुक
नक्काशी भरे पलों को
की तभी पहचान लिया
किसी ने उसे
थामे हाथों में
कुछ बीते दिनों के
जिंदा एहसास.

वो मिली उससे तो
महक गया
एक आइना अतीत का
और खुलगया एक संदूक
एहसासों का,
जैसे सुबह की की दहलीज़ पर
सूरज की पहली किरण
जैसे पहली बारिश मे
भीगा बदन.

वो आज भी ढूढती है
उन बंद दरवाजों मे
घूमते फ़रिश्ते,
वो आज भी कैद है
उन चार दीवारों मे
बतियायी हुई सी.

जिस्म जवाँ होगया है मगर,
मन अभी भी है मुन्नी सा…

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