
मैंने तो
सिर्फ़ शब्द कहे थे।
अर्थ
सब अपने-अपने
घर से लेकर आए थे।
किसी को
उनमें प्रेम दिखाई दिया,
किसी को
अहंकार।
किसी ने
सलाह समझी,
किसी ने
अपमान।
तब समझ आया…
शब्द
कभी झगड़ा नहीं करते,
झगड़ा
उन अर्थों का होता है,
जो हम
उनके भीतर रख देते हैं।
मैं बदल नहीं रहा था,
बस
चुप रहना छोड़ रहा था।
और लोग
मेरी आवाज़ नहीं,
अपने डर
सुन रहे थे।
फिर मैंने
बोलना भी नहीं छोड़ा,
और
समझाना भी नहीं।
क्योंकि
समझ
शब्दों से नहीं,
तैयारी से आती है।
जिस मन में
पहले से निर्णय भरा हो,
वहाँ
संवाद नहीं पहुँचता।
अब
कोई बुरा मान जाए,
तो मैं
उसे मनाने नहीं जाता।
क्योंकि
हर बात
सबके लिए नहीं होती।
और
हर कान
सुनने के लिए नहीं,
कुछ
सिर्फ़ उत्तर देने के लिए बने होते हैं।
आज
मैंने अपनी बातों को
हल्का कर दिया है।
जो समझना चाहे,
समझ ले।
जो ठहरना चाहे,
ठहर जाए।
जो ठहर जाए,
उसका धन्यवाद।
जो चला जाए,
उसका भी धन्यवाद।
क्योंकि
मैंने जाना है—
बातों की कीमत,
उन्हें कहने में नहीं होती।
उन्हें सुनने वाली
दृष्टि में होती है।
और जहाँ दृष्टि खुल जाती है,
वहाँ कोई बुरा नहीं मानता…
वहाँ केवल समझ जन्म लेती है।
— यतीष जैन
www.yatishjain.com




