ज़िंदगी तो ज़िंदगी है, चलती रहती है अपनी ही गति से। हम उसे मायने देते हैं, बाँधते हैं दिन, तारीख़ और सालों में।
उसमें रंग भरते हैं— सुख और दुःख के।
रिश्ते बनते हैं, बिगड़ते हैं। कभी सफलता मिलती है, कभी असफलता मिलती है।
हम थकते नहीं, बस चलते रहते हैं, अपने कर्म करते रहते हैं। और यह भूल जाते हैं— कि हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं? कहाँ जाना है? क्या कमाना है? और क्या साथ ले जाना है?
आओ, इस नए साल में थोड़ा चिंतन कर लें, इस बार अपने आप को जान लें।
रिटर्न टिकट लेकर ही हम पैदा हुए थे, बस तारीख़ नहीं पता हमें— कि वापसी कब हो जाएगी।
भगवान भी यहाँ सदा के लिए नहीं रुके, और न हम यहाँ सदा के लिए हैं। आओ, इस 25–26 की गिनती से थोड़ा ऊपर उठ लें, इस बार कुछ सच में नया कर लें।
आओ, खुद से फिर मिल लें— जो दूसरों में बिखर गया है। आओ, हम दूसरों के साथ खुद को नया रच लें।
क्योंकि हम एक समाज हैं, समाज में लोग हैं। हम हैं तो लोग हैं, और लोग हैं तो हम हैं।
आओ, एक-दूसरे में कुछ विश्वास रख लें, आओ, मिलकर कुछ नया कर लें।
कभी हम भी आए थे इस जगह ऐसे ही, जैसे आज ये युवा आए हैं। और बना था एक माहौल —
सब कुछ साझा करने का, जो अंदर था, जो बाहर था। आज फिर हमने देखा कि हम कहानियों की दुनिया में जीते हैं।
कुछ भी हुआ, तो बना डाला एक कहानी-संग्रह, जिसमें माँ-बाप, रिश्तेदार, दोस्त, भाई, बहन —
सब किरदार होते हैं। और इस कहानी के रचयिता हम ही होते हैं।
आज फिर हमने जाना कि इन कहानियों का जीवन की घटनाओं से कोई लेना-देना नहीं है। सब हमारी ही कल्पना है, और यही है हमारे दुःख और अव्यवस्था का कारण।
आज हमने एक और शस्त्र फिर से पकड़ा — रैकेट नहीं, रैकेट लॉन्चर, जो हम ख़ुद ही हैं। आज हम फिर एक ऐसे स्पेस में पहुँचे जहाँ हम ख़ुद — ख़ुद से मिले, जो कहीं खो गए थे।
आज हम फिर ट्रांसफ़ार्म हुए। अब हम लेखक तो हैं, पर हमारी कहानियाँ पॉसिबिलिटी की हैं, क्षमा की हैं, नई संभावनाओं की हैं।
अब हम रैकेट तो चलाएँगे, पर कमिटमेंट की रेस्पॉन्सिबिलिटी के साथ। क्योंकि आज हमें शंकर मिले हैं, जिन्होंने दिखाया — तांडव इंटीग्रिटी का, एम्प्टी और मीनिंगलेस दुनिया में अनंत पॉसिबिलिटी के साथ।
मैं पानी हूँ, पाँच तत्वों में एक कहानी हूँ। मैं बादलों में, मैं नदियों में, मैं धरती के नीचे छुपा पानी हूँ।
मैं ही बहता हूँ आप की नस-नस में, शरीर में 70% तक बसता हूँ। पृथ्वी की गोद में भी 71% बनके चमकता हूँ।
मैं ज़हर भी बनता हूँ, अगर तुम मुझे गंदा कर दो। मैं अमृत भी बनता हूँ, अगर तुम मुझे समझ कर बरतो।
मैं सुनता हूँ, मैं समझता हूँ, मैं सिर्फ़ बहता नहीं—कहता भी हूँ। मैं सेहत लाता हूँ… पर बीमारियाँ भी साथ में लाता हूँ—
हैजा, टाइफाइड, दस्त, हेपेटाइटिस, कैंसर तक को न्यौता दे जाता हूँ। क्यों? क्योंकि तुमने मुझे जाने बिना अपनाया!
तय तुम करोगे— मैं जीवन बनूँ… या विनाश? मैं दोस्त बनूँ… या बीमारी की तलाश?
जो मेरी कद्र करता है, मैं उसे तंदुरुस्ती देता हूँ। जो मुझे नजरअंदाज़ करता है, मैं उसकी ज़िंदगी से खेल जाता हूँ।
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“जल है तो कल है — लेकिन साफ़ जल है तो स्वस्थ कल है।”