
जब किसी सफेद कैनवास पर
कुछ प्रकट होता है,
तो वह एक निशान छोड़ जाता है।
और वही निशान
हम
रंग कहते हैं।
एक बार पहला रंग उभर जाए,
तो फिर सिलसिला शुरू हो जाता है—
एक रंग के बाद दूसरा,
परत दर परत,
जब तक कि कैनवास
अनगिनत रंगों से भर न जाए।
मन भी
कुछ ऐसा ही है।
जब हम जन्मे थे,
मन निर्मल था—
शांत, पारदर्शी,
जैसे अछूती सफेद रोशनी।
फिर पहली घटना घटी।
एक क्षण ने
अपना निशान छोड़ा।
एक रंग प्रकट हुआ।
एक रिश्ता बना,
और उसी रिश्ते के माध्यम से
हमने दुनिया को पहचानना शुरू किया।
दिन-ब-दिन
नए रंग आते गए।
हमने उन्हें नाम दिए—
मित्र,
परिवार,
प्रेम,
पीड़ा,
स्मृतियाँ।
धीरे-धीरे
मन
रिश्तों का एक कैनवास बन गया।
और अब—
मन रंगों से भरा हुआ है।
कुछ उजले,
कुछ गहरे।
कुछ जिन्हें हम संजोते हैं,
और कुछ जिन्हें हम घाव बनाकर ढोते हैं।
आज होली है—
रंगों का उत्सव।
पर एक अजीब सा प्रश्न उठता है—
हम रंग खेलें तो किस पर?
क्योंकि आज
हर कोई पहले से ही
रंगों से ढका हुआ है।
इतनी परतें
एक-दूसरे के ऊपर चढ़ चुकी हैं
कि अब पहचानना कठिन है
किसका रंग किसका है।
और एक सरल सत्य है—
रंगों पर रंग नहीं चढ़ते,
रंग तो केवल सफेदी पर ही चढ़ते हैं।
शायद होली का निमंत्रण
कुछ और गहरा है।
रंग डालने से पहले
चलो वापस लौटें
उस सफेदी में।
मन को साफ करें।
फिर से खाली हों।
फिर से पारदर्शी बनें।
और जब मन फिर से सफेद हो जाएगा—
हर रिश्ता
एक उत्सव बन जाएगा।
तब
हम केवल एक दिन
होली नहीं खेलेंगे…
हम
पूरे वर्ष
जीवन के साथ
होली खेलते रहेंगे।











