किसी ने
एक छोटा-सा पौधा रोपा था।

न कोई शोर,
न कोई दावा,
न कोई चमत्कार।

बस एक फूल खिला था।

और आज उस फूल के चारों ओर
अनगिनत मधुमक्खियाँ मंडरा रही थीं।

वे समझ रही थीं
कि वे रस लेने आई हैं।
पर वह रस नहीं था।

वह तो जैसे
ब्रह्माण्ड द्वारा भेजा गया
एक जागरण-संदेश था।

एक ऐसी औषधि,
जो शरीर को नहीं,
चेतना को स्वस्थ करती है।

वे लौटीं तो सही
अपने-अपने छत्तों की ओर,
पर खाली हाथ नहीं।

वहाँ छोड़ आई थीं
अपनी कहानियाँ,
अपने रैकेट,
अपने बहाने,
अपनी सीमाएँ,
अपनी बनाई हुई पहचानें,

और वे सारे “विनिंग फ़ॉर्मूले”
जिन्हें पकड़कर वे समझती थीं
कि यही जीवन है।

आज पहली बार
उन्हें दिखाई दिया था
कि जिस जीवन को वे जी रही थीं,
उसका अधिकांश हिस्सा
वास्तविकता नहीं,
बल्कि उनकी अपनी रचना था।

विचारों की रचना,
निष्कर्षों की रचना,
डरों की रचना।

आज पहली बार
उन्होंने जाना था
कि सुख का निर्माता भी वही है,

दुःख का निर्माता भी वही।
बंधन का शिल्पकार भी वही,
और मुक्ति का द्वार भी वही।

आज उनका परिचय
दुनिया से नहीं
स्वयं से हुआ था।

आज उन्होंने जीवन को
“जैसा है, वैसा है”
की निर्मल दृष्टि से देखा था।

बिना निर्णय।
बिना प्रतिरोध।
बिना कहानी।

मैंने भगवान को तो नहीं देखा,
पर किसी को
उसका कार्य करते अवश्य देखा।

वह लोगों के छत्तों में
शहद नहीं,
जागरूकता भर रहा था।

वह लोगों को बदल नहीं रहा था,
उन्हें स्वयं से मिला रहा था।

वह फूल नहीं बाँट रहा था,
वह लोगों को
फूल बनना सिखा रहा था।

कैसे खिलना है,
कैसे महकना है,
कैसे अपने अस्तित्व से ही
दूसरों के जीवन में
नया मौसम ले आना है।

ताकि जहाँ भी जाएँ,
पराग फैलाएँ।
नई संभावनाएँ जगाएँ।
सोई हुई चेतना को छू जाएँ।

और तब मैंने देखा—

पूरा वातावरण बदल गया था।
फूल वही थे,
मधुमक्खियाँ वही थीं,

दुनिया भी वही थी,
पर दृष्टि बदल गई थी।

और जब दृष्टि बदलती है,
तो सृष्टि खिल उठती है।

आज केवल बगीचा नहीं खिला था,
आज भीतर का मन भी खिल गया था।

आज मैं केवल यतीष नहीं रहा—

आज मैं भी पराग बन गया।
आज मैं भी पराग बन गया।


🌼 Yatish Jain 🌼
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