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— जिंदगी अपने आप नहीं होती, उसे रचना पड़ता है।

हम सब
ज़िंदगी जीने नहीं आए थे,

हम तो
अपनी-अपनी कहानियाँ निभाने आए थे।

किसी की कहानी थी—
“मैं पर्याप्त नहीं हूँ।”

किसी की—
“मुझे कोई नहीं समझता।”

किसी ने लिख लिया था—
“मेरे बस की बात नहीं।”

और फिर…

पूरी ज़िंदगी
उसी कहानी को
साबित करने में निकल गई।

हम समझते रहे
कि परिस्थितियाँ
हमारा जीवन लिख रही हैं।

पर शायद…

परिस्थितियाँ लेखक नहीं थीं,

वे तो केवल
कागज़ थीं।

कलम तो
हमारे हाथ में थी।


मैंने देखा—

एक ही पेड़ के नीचे
दो लोग बैठे थे।

पहला सोच रहा था—
“मुझे इस पेड़ से क्या मिल सकता है?”

दूसरा मुस्कुरा रहा था—
“मैं इस पेड़ को क्या दे सकता हूँ?”

पेड़ वही था।
धूप वही थी।
हवा वही थी।
बदला क्या था?

संदर्भ।

और जब
संदर्भ बदल गया,

तो वास्तविकता भी
नई दिखाई देने लगी।


ज़िंदगी
घटनाओं से नहीं बनती।

घटनाओं को
तुम जिस संदर्भ से देखते हो,
ज़िंदगी वहाँ से बनती है।

संदर्भ…

कोई विचार नहीं।
कोई विश्वास नहीं।
कोई सिद्धांत नहीं।

संदर्भ तो
वह आकाश है

जिसमें
तुम्हारी पूरी दुनिया
अपना अर्थ पाती है।


यदि संदर्भ नहीं चुनोगे,

तो परिस्थितियाँ
तुम्हारा संदर्भ चुन लेंगी।

फिर तुम
हर दिन
प्रतिक्रिया बनकर जीओगे।

कभी मौसम के अनुसार,
कभी लोगों के अनुसार,
कभी बाज़ार के अनुसार,
कभी अपनी पुरानी कहानियों के अनुसार।

और तुम्हें लगेगा—

यही जीवन है।


पर…

जिस दिन तुमने
घोषणा कर दी—

“मैं फर्क पैदा करता हूँ।”

उसी दिन
दुनिया नहीं बदली,

पर दुनिया का अर्थ बदल गया।

लोग वही रहे।
समस्याएँ वही रहीं।
संघर्ष भी वही रहे।

लेकिन…

तुम
अब उनका परिणाम नहीं थे।

तुम
उनका संदर्भ बन चुके थे।


सॉक्रेटीस ने कहा था—

“जिस जीवन की जाँच नहीं की गई,
वह जीने योग्य नहीं।”

मैं कहता हूँ—

जिस जीवन का
संदर्भ नहीं रचा गया,

वह जीवन
दूसरों की लिखी हुई पटकथा है।


हम
ज़िंदगी से गुज़र रहे हैं,
और एक दिन
गुज़र जाएँगे।

पर…

जिएँगे कब?
ज़िंदगी काटनी क्यों है?

क्या उसे
रचना नहीं है?
क्या उसे
महकाना नहीं है?


लोग पूछते हैं—

“मुझे क्या मिलेगा?”

मैं पूछता हूँ—

“तुम क्या बनोगे?”

क्योंकि

जो केवल पाना चाहता है,
वह परिस्थितियों का कैदी है।

जो देना शुरू कर देता है,
वह संदर्भ का निर्माता है।


हर सुबह

अपने आप से केवल एक प्रश्न पूछो—

आज मैं
परिस्थितियों का परिणाम बनूँगा,

या
उनका संदर्भ?


क्योंकि

ज़िंदगी में ज़िंदगी होती नहीं,
डालनी पड़ती है।

और

तुम्हारी ज़िंदगी में

वह जीवन,
वह अर्थ,
वह प्रेम,
वह संभावना,
कोई और नहीं डालेगा।

उसकी पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी है।


इसलिए

अपनी कहानी मत बदलो।
अपना संदर्भ बदलो।

क्योंकि

जिस क्षण
संदर्भ बदलता है,

उसी क्षण
वास्तविकता का अर्थ बदल जाता है।

और जब अर्थ बदलता है,

तब वही जीवन,
जो कल तक बोझ था,

आज
एक उत्सव बन जाता है।

शायद…

जिंदगी जीने की शुरुआत वहीं से होती है।

Yatish Jain
http://www.yatishjain.com

One Response to “संदर्भ (Context) और जिंदगी”

  1. Shripal Singh Says:

    “परिस्थितियाँ लेखक नहीं थीं, वे तो केवल कागज़ थीं। कलम तो हमारे हाथ में थी” — यह पंक्ति विशेष रूप से मन को छू गई। अक्सर हम अपने जीवन की सीमाओं का कारण परिस्थितियों को मान लेते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन हमारे द्वारा चुने गए संदर्भ से शुरू होता है।
    लेख यह याद दिलाता है कि जीवन घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि उन घटनाओं को दिए गए अर्थ का परिणाम है। “अपनी कहानी मत बदलो, अपना संदर्भ बदलो” केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शक्तिशाली निमंत्रण है।

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