अर्थों के बीच कविता – शब्द, अर्थ और संवाद पर आधारित मौलिक हिंदी कविता | यतीष जैन
“शब्द कभी झगड़ा नहीं करते, झगड़ा उन अर्थों का होता है, जो हम उनके भीतर रख देते हैं।”

मैंने तो
सिर्फ़ शब्द कहे थे।

अर्थ
सब अपने-अपने
घर से लेकर आए थे।

किसी को
उनमें प्रेम दिखाई दिया,
किसी को
अहंकार।

किसी ने
सलाह समझी,
किसी ने
अपमान।

तब समझ आया…
शब्द
कभी झगड़ा नहीं करते,

झगड़ा
उन अर्थों का होता है,
जो हम
उनके भीतर रख देते हैं।

मैं बदल नहीं रहा था,
बस
चुप रहना छोड़ रहा था।

और लोग
मेरी आवाज़ नहीं,
अपने डर
सुन रहे थे।

फिर मैंने
बोलना भी नहीं छोड़ा,
और
समझाना भी नहीं।

क्योंकि

समझ
शब्दों से नहीं,
तैयारी से आती है।

जिस मन में
पहले से निर्णय भरा हो,
वहाँ
संवाद नहीं पहुँचता।

अब
कोई बुरा मान जाए,
तो मैं
उसे मनाने नहीं जाता।

क्योंकि
हर बात
सबके लिए नहीं होती।
और
हर कान
सुनने के लिए नहीं,

कुछ
सिर्फ़ उत्तर देने के लिए बने होते हैं।

आज
मैंने अपनी बातों को
हल्का कर दिया है।

जो समझना चाहे,
समझ ले।
जो ठहरना चाहे,
ठहर जाए।

जो ठहर जाए,
उसका धन्यवाद।
जो चला जाए,
उसका भी धन्यवाद।

क्योंकि
मैंने जाना है—

बातों की कीमत,
उन्हें कहने में नहीं होती।

उन्हें सुनने वाली
दृष्टि में होती है।

और जहाँ दृष्टि खुल जाती है,
वहाँ कोई बुरा नहीं मानता…

वहाँ केवल समझ जन्म लेती है।

— यतीष जैन
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— जिंदगी अपने आप नहीं होती, उसे रचना पड़ता है।

हम सब
ज़िंदगी जीने नहीं आए थे,

हम तो
अपनी-अपनी कहानियाँ निभाने आए थे।

किसी की कहानी थी—
“मैं पर्याप्त नहीं हूँ।”

किसी की—
“मुझे कोई नहीं समझता।”

किसी ने लिख लिया था—
“मेरे बस की बात नहीं।”

और फिर…

पूरी ज़िंदगी
उसी कहानी को
साबित करने में निकल गई।

हम समझते रहे
कि परिस्थितियाँ
हमारा जीवन लिख रही हैं।

पर शायद…

परिस्थितियाँ लेखक नहीं थीं,

वे तो केवल
कागज़ थीं।

कलम तो
हमारे हाथ में थी।


मैंने देखा—

एक ही पेड़ के नीचे
दो लोग बैठे थे।

पहला सोच रहा था—
“मुझे इस पेड़ से क्या मिल सकता है?”

दूसरा मुस्कुरा रहा था—
“मैं इस पेड़ को क्या दे सकता हूँ?”

पेड़ वही था।
धूप वही थी।
हवा वही थी।
बदला क्या था?

संदर्भ।

और जब
संदर्भ बदल गया,

तो वास्तविकता भी
नई दिखाई देने लगी।


ज़िंदगी
घटनाओं से नहीं बनती।

घटनाओं को
तुम जिस संदर्भ से देखते हो,
ज़िंदगी वहाँ से बनती है।

संदर्भ…

कोई विचार नहीं।
कोई विश्वास नहीं।
कोई सिद्धांत नहीं।

संदर्भ तो
वह आकाश है

जिसमें
तुम्हारी पूरी दुनिया
अपना अर्थ पाती है।


यदि संदर्भ नहीं चुनोगे,

तो परिस्थितियाँ
तुम्हारा संदर्भ चुन लेंगी।

फिर तुम
हर दिन
प्रतिक्रिया बनकर जीओगे।

कभी मौसम के अनुसार,
कभी लोगों के अनुसार,
कभी बाज़ार के अनुसार,
कभी अपनी पुरानी कहानियों के अनुसार।

और तुम्हें लगेगा—

यही जीवन है।


पर…

जिस दिन तुमने
घोषणा कर दी—

“मैं फर्क पैदा करता हूँ।”

उसी दिन
दुनिया नहीं बदली,

पर दुनिया का अर्थ बदल गया।

लोग वही रहे।
समस्याएँ वही रहीं।
संघर्ष भी वही रहे।

लेकिन…

तुम
अब उनका परिणाम नहीं थे।

तुम
उनका संदर्भ बन चुके थे।


सॉक्रेटीस ने कहा था—

“जिस जीवन की जाँच नहीं की गई,
वह जीने योग्य नहीं।”

मैं कहता हूँ—

जिस जीवन का
संदर्भ नहीं रचा गया,

वह जीवन
दूसरों की लिखी हुई पटकथा है।


हम
ज़िंदगी से गुज़र रहे हैं,
और एक दिन
गुज़र जाएँगे।

पर…

जिएँगे कब?
ज़िंदगी काटनी क्यों है?

क्या उसे
रचना नहीं है?
क्या उसे
महकाना नहीं है?


लोग पूछते हैं—

“मुझे क्या मिलेगा?”

मैं पूछता हूँ—

“तुम क्या बनोगे?”

क्योंकि

जो केवल पाना चाहता है,
वह परिस्थितियों का कैदी है।

जो देना शुरू कर देता है,
वह संदर्भ का निर्माता है।


हर सुबह

अपने आप से केवल एक प्रश्न पूछो—

आज मैं
परिस्थितियों का परिणाम बनूँगा,

या
उनका संदर्भ?


क्योंकि

ज़िंदगी में ज़िंदगी होती नहीं,
डालनी पड़ती है।

और

तुम्हारी ज़िंदगी में

वह जीवन,
वह अर्थ,
वह प्रेम,
वह संभावना,
कोई और नहीं डालेगा।

उसकी पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी है।


इसलिए

अपनी कहानी मत बदलो।
अपना संदर्भ बदलो।

क्योंकि

जिस क्षण
संदर्भ बदलता है,

उसी क्षण
वास्तविकता का अर्थ बदल जाता है।

और जब अर्थ बदलता है,

तब वही जीवन,
जो कल तक बोझ था,

आज
एक उत्सव बन जाता है।

शायद…

जिंदगी जीने की शुरुआत वहीं से होती है।

Yatish Jain
http://www.yatishjain.com

किसी ने
एक छोटा-सा पौधा रोपा था।

न कोई शोर,
न कोई दावा,
न कोई चमत्कार।

बस एक फूल खिला था।

और आज उस फूल के चारों ओर
अनगिनत मधुमक्खियाँ मंडरा रही थीं।

वे समझ रही थीं
कि वे रस लेने आई हैं।
पर वह रस नहीं था।

वह तो जैसे
ब्रह्माण्ड द्वारा भेजा गया
एक जागरण-संदेश था।

एक ऐसी औषधि,
जो शरीर को नहीं,
चेतना को स्वस्थ करती है।

वे लौटीं तो सही
अपने-अपने छत्तों की ओर,
पर खाली हाथ नहीं।

वहाँ छोड़ आई थीं
अपनी कहानियाँ,
अपने रैकेट,
अपने बहाने,
अपनी सीमाएँ,
अपनी बनाई हुई पहचानें,

और वे सारे “विनिंग फ़ॉर्मूले”
जिन्हें पकड़कर वे समझती थीं
कि यही जीवन है।

आज पहली बार
उन्हें दिखाई दिया था
कि जिस जीवन को वे जी रही थीं,
उसका अधिकांश हिस्सा
वास्तविकता नहीं,
बल्कि उनकी अपनी रचना था।

विचारों की रचना,
निष्कर्षों की रचना,
डरों की रचना।

आज पहली बार
उन्होंने जाना था
कि सुख का निर्माता भी वही है,

दुःख का निर्माता भी वही।
बंधन का शिल्पकार भी वही,
और मुक्ति का द्वार भी वही।

आज उनका परिचय
दुनिया से नहीं
स्वयं से हुआ था।

आज उन्होंने जीवन को
“जैसा है, वैसा है”
की निर्मल दृष्टि से देखा था।

बिना निर्णय।
बिना प्रतिरोध।
बिना कहानी।

मैंने भगवान को तो नहीं देखा,
पर किसी को
उसका कार्य करते अवश्य देखा।

वह लोगों के छत्तों में
शहद नहीं,
जागरूकता भर रहा था।

वह लोगों को बदल नहीं रहा था,
उन्हें स्वयं से मिला रहा था।

वह फूल नहीं बाँट रहा था,
वह लोगों को
फूल बनना सिखा रहा था।

कैसे खिलना है,
कैसे महकना है,
कैसे अपने अस्तित्व से ही
दूसरों के जीवन में
नया मौसम ले आना है।

ताकि जहाँ भी जाएँ,
पराग फैलाएँ।
नई संभावनाएँ जगाएँ।
सोई हुई चेतना को छू जाएँ।

और तब मैंने देखा—

पूरा वातावरण बदल गया था।
फूल वही थे,
मधुमक्खियाँ वही थीं,

दुनिया भी वही थी,
पर दृष्टि बदल गई थी।

और जब दृष्टि बदलती है,
तो सृष्टि खिल उठती है।

आज केवल बगीचा नहीं खिला था,
आज भीतर का मन भी खिल गया था।

आज मैं केवल यतीष नहीं रहा—

आज मैं भी पराग बन गया।
आज मैं भी पराग बन गया।


🌼 Yatish Jain 🌼
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